पुष्पी पौधों में लैंगिक जनन

  • जब पुष्प में पुंकेसर अथवा स्त्रीकेसर में से कोई एक जननांग उपस्थित होता है तो पुष्प एकलिंगी कहलाते हैं।

        उदहारण :- पपीता , तरबूज आदि

  • जब पुष्प में पुंकेसर और स्त्रीकेसर दोनों  उपस्थित होते हैं, तो उन्हें उभयलिंगी पुष्प कहते हैं।

उदहारण :- गुड़हल , सरसों।

         स्त्रीकेसर –  पुष्प का मादा भाग                        पुंकेसर –  पुष्प का नर भाग

स्त्रीकेसर 3 भागों से मिलके बनता है –

  • आधार पर उभरा – फुला भाग  अंडाशय
  • मध्य में लम्बा भाग  वर्तिका
  • शीर्ष भाग वर्तिकाग्र

पुंकेसर 2 भागों से मिलके बनता है :-

a). परागकोष b). तंतु

  • अंडाशयमें बीज़ांड होते हैं तथा प्रत्येक बीजांड में एक अंड कोशिका होती है |
  • अंड कोशिकाही मादा युग्मक होती है।
  • परागकणों का किसी माध्यम जैसे वायु, जल या कीटों द्वारा पुकेंसर  से वर्तिकाग्र तक स्थानांतरण को परागण कहते हैं।

परागण दो प्रकार का होता है।

1 ). स्वपरागण 2). परपरागण

यदि परागकरणों का स्थानांतरण उसी पुष्प के वर्तिकाग्र पर होता हैतो यह स्वपरागण कहलाता है।

जब एक पुष्प के परागकण दूसरे पुष्प के वर्तिकाग्र पर स्थानांतरित होते हैं तो उसे परपरागण कहते हैं

जब नर युग्मक मादा युग्मक के साथ संलयन करता है तो युग्मनज बनता है इस प्रक्रिया को निषेचन कहते हैं।

निषेचन के बाद अंडाशय फल में बदल जाता है और बीजांड बीज में बदल जाता है।

परागण व निषेचन मेंअंतर :-

                 परागण               निषेचन
1. इस प्रक्रम में परागण वर्तिकाग्र तक पहुंचते हैं।  
2. यह जनन क्रिया का प्रथम चरण है।  
3. यह दो प्रकार का होता है – स्वपरागण व परपरागण |
4. इस क्रिया के लिए वाहकों की आवश्यकता होती है।
5. इसमें बहुत से परागकण व्यर्थ जाते हैं।      
1. इस प्रक्रम में नर एवं मादा युग्मको का संलयन होता है।
2. यह जनन क्रिया का दूसरा चरण है।  
3. यह दो प्रकार की होती है आंतरिक व बाहरी निषेचन |
4. इस क्रिया में वाहकों की आवश्यकता नहीं होती  |
5. इसमें परागकण व्यर्थ नहीं जाते ।    

मानव में लैंगिक जनन

किशोरावस्था में होनें वाले परिवर्तन

ऐसे परिवर्तन जो लड़के लड़कियों में एक समान होने वाले परिवर्तन :-

  1. काँख व जाँघों के मध्य जननांगी क्षेत्र में बाल गुच्छ निकल आते हैं।

            तथा इनका रंग भी गहरा हो जाता है।

  • हाथ, पैर व चेहरे पर भी महीन रोम आ जाते हैं।
  • त्वचा तैलिय हो जाती है।
  • चेहरे पर मुहाँसे निकल आते हैं।
  • विपरीत लिंग की ओर आकर्षण बढ जाता है।

केवल लड़कियों में होने वाले परिवर्तन :-

  1. स्तन के आकार में वृद्धि होने लगती है।
  2. स्तनाग्र की त्वचा का रंग भी गहरा हो जाता है।
  3. रजोधर्म होने लगता है।

केवल लड़कों में होने वाले परिवर्तन :-

  1. लड़को के चेहरे पर दाढ़ी मूँछ निकल आती है।
  2. आवाज फटने लगती है।
  3. दिवास्वप्न या रात्री में शिशन विवर्धन के कारण ऊर्ध्व हो जाता है।
  • किशोरावस्था कि जिस अवधि में जनन- ऊत्तक परिपक्व होना प्रारंभ करते हैं, उस अवधि को यौवनारंभ कहते हैं।

मानव जनन तंत्र

 नर जनन तंत्र :-

  1. शुक्राणु :-

a). शुक्राणु सुक्ष्म सरचनाएं होती है जिसमे आनुवंशिक पदार्थ होता है।

b). इसकी एक पुँछ होती है जो मादा जनन कोशिका की ओर तैरने में सहायता करती है |

2. वृषण :-

वृषण के कार्य :-

a). नर जनन कोशिका अथवा शुक्राणु का निर्माण वृषण में होता है।

  b).टेस्टोस्टेरॉन हार्मोन का उत्पादन भी वृषण के द्वारा होता है।

  • टेस्टोस्टेरॉन के कार्य :-

a). यह शुक्राणुओं के उत्पादन को नियंत्रित करता है।

b).लड़कों में यौवनारंभ के लक्षणों को भी नियंत्रित करता है।

3. शुक्रवाहिका :-

शुक्रवाहिका उत्पादित शुक्राणु को मोचन करती है।

4. प्रोस्ट्रेट तथा शुक्राशय

प्रोस्ट्रेट अपना स्राव शुक्रवाहिका में डालते हैं तथा शुक्राणु एक तरल माध्यम में आ जाते हैं।

जिसके कारण – 1).  इनका स्थानांतरण आसानी से होता है।

           2). इन्हें पोषण भी प्राप्त होता है।

मादा जनन तंत्र :-

  1. अंडाशय :-

मादा जनन कोशिका या अंड कोशिका का निर्माण अंडाशय में होता है।

लड़की के जन्म के समय से ही अंडाशय में हजारों अपरिपक्व अंड होते हैं | यौवनारंभ में दो अंडाशय में से किसी एक से हर माह एक अंड परिपक्व होने लगता है।

 2.अंडवाहिका :- यह अंडकोशिका को गर्भाशय तक पहुंचाती है।

3. गर्भाशय :- दोनों अंडवाहिका मिलकर एक लचीली थैलीनमा सरंचना का निर्माण करती है जिसे गर्भाशय कहते हैं। गर्भाशय, ग्रीवा द्वारा योनि में खुलता है |

  • मैथुन के समय शुक्राणु योनि में स्थापित होते हैं और गति करके अंडकोशिका तक पहुंच जाते हैं। शुक्राणु व अंडकोशिका का संलयन होता है इस प्रक्रम को निषेचन कहते हैं | निषेचित अंड विभाजित होकर भ्रुण बनाता है। यह भ्रुण गर्भाशय में स्थापित हो जाता है।

माँ के शरीर में गर्भस्थ भ्रुण को पोषण किस प्रकार प्राप्त होता है।

भ्रुण को माँ के शरीर से ही पोषण मिलता है इसके लिए एक विशेष सरंचना होती है जिसे प्लैसेंटा कहते हैं। यह एक तश्तरीनुमा सरंचना है जो गर्भाशय की भित्ति में धंसी होती है।यह माँ से भ्रुण की ग्लूकोज ऑक्सीजन व अन्य पदाथों के स्थानांतरण के लिए क्षेत्र प्रदान करता है। भ्रुण का अपशिष्ट पदार्थों का निपटान भी प्लेसेंटा के माध्यम से मां के रुधिर में स्थानांतरण द्वारा होता है।

क्या होता है जब अँड का निषेचन नहीं होता  ?    या

रजोधर्म क्या होता है ?    या

 ऋतुस्राव क्या होता है ?

यदि अंड कोशिका का निषेचन नहीं तो यह लगभग एक दिन ही जीवित रहती है क्योंकि अंडाशय हर माह एक अंड उत्पन्न करता है। गर्भाशय भी निषेचित अंड के ए हर माह तैयारी करता है। अत: इसकी अंतःभित्ति मांसल एवं स्पांजी हो जाती है। यह निषेचित अंड को पोषण प्रदान करती है परन्तु निषेचन म होने की अवस्था में इस परत की भी आवश्यकता नहीं रहती तो यह परत धीरे-2 टुटकर योनि मार्ग से रुधिर एवं म्यूकस के रूप में निषकासित होती है।

इस चक्र में लगभग एक माह का समय लगता है से रजोधर्म या ऋतुस्राव कहते हैं। इसकी अवधि 2 से 8 दिन की होती है।

जनन स्वास्थ्य

लैंगिक संचरण से होने वाले रोग, इनमें जीवाणु जनित जैसे गोनेरिया व सिफलिस एवं वाइरस संक्रमण जैसे मस्सा व  HIV – AIDS आदि हैं।

गर्भधारण को रोकने के उपाय :- गर्भरोधी तरीके अनेक प्रकार के हैं-

  1. यांत्रिक अवरोध :-

इस उपाय में नर कंडोम का उपयोग कर सकता है जिससे शुक्राण अंडकोशिका तक नहीं पहुंच पाएगा |

2. हार्मोन का असंतुलन  :-

मादाएं कुछ दवाएं लेकर शरीर में हार्मोन को असंतुलित कर सकती है जिससे अंड का मोचन नहीं होगा और निषेचन भी नहीं होगा।

3. शल्यक्रिया तकनीक  :-

इस तकनीक के द्वारा नर की शुक्रवाहिकाओं को अवरुद्ध कर दिया जाता है जिससे शुक्राणुओं का स्थानांतरण भी रुक जाता है और यदि मादा की अंडवाहिनी को अवरुद्ध कर दिया जाए तो अंड, गर्भाशय तक नहीं पहुंच पाएगा |

4. अन्य युक्ति  :- मादाएं, गर्भाशय में कॉपर ही स्थापित करके भी गर्भधारण को रोक सकती हैं।

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